Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verses 16–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verses 16–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
उद्गीर्णमन्त्रनिचयान्स्वाहाकारनिभस्वनान् ।
अस्थिनैकतडित्पुञ्जनीलमेघसमोपमान् ॥ १६ ॥
देवैर्निरीक्षितान्नित्यं यज्ञवेदिलतादलान् ।
शुकान्कार्शानवाञ्छयामाञ्छिशूञ्छिखिशिखाशिखान् ॥ १७ ॥
गौरीरक्षितबर्हौघान्कौमारान्वरबर्हिणः ।
स्कन्दोपन्यस्तनिःशेषशैवविज्ञानकोविदान् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ निवास कर रहे अग्नि के वाहनभूत शुको का वर्णन करते हैं।
तदनन्तर मैने अग्निदेव के वाहन शुक देखे, वे मन्त्र-समूह पढ़ रहे थे, उनके शब्द स्वाहाकार के
समान थे । उनकी उपमा शंख, बिजलियो के अनेक समूह और नील मेघो के वर्णो से थी, देवता नित्य
उनका दर्शन करते थे । यज्ञवेदियों में बिछाये गये हरित कुश-लताओं के दलों की नाई वे हरे थे। (अब
मयूरों के बच्चों का वर्णन करते हैं।) अनन्तर (मेने) मयूरों के वच्चे (देखे) । अग्नि की शिखा की नाई
देदीप्यमान उनकी शिखाएँ थीं । जगज्जननी पार्वती से (जूड़े में पहनने के लिए) रक्षित उनके परो का
समूह था, स्वामी कार्तिकिय द्वारा विस्तारित अशेष शिवसम्बन्धी विज्ञान में वे पण्डित थे