Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
सौम्यः प्रसन्नमधुरो रसवान्महात्मा हृद्यः सरोवर इवान्तरखण्डशैत्यः ।
हृत्पुण्डरीककुहरं व्यवहारवेत्ता गाम्भीर्यमच्छमजहात्प्रकटाशयश्रीः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार सरोवर सौम्य, स्वच्छ मधुर जल से
युक्त, मनोहर ओर भीतर से अखण्ड शीतल, मध्य कमल के आधारभूत कुहर से युक्त, पक्षियों की
विश्रान्ति को जाननेवाला एवं निर्मलतम होने से प्रकटित भीतरी शोभावाला रहता है, उसी प्रकार
सौम्य, प्रसन्न, मधुर, ब्रह्मरस से युक्त, मनोहर, भीतरी अखण्ड शान्ति से युक्त, हदयाकाशरूप,
सब व्यवहारो को जाननेवाला यह महात्मा भुशुण्ड भी गांभीर्य को न छोड़ता हुआ अन्तःकरण की
शोभा महत्ता को प्रकटित कर अवस्थित था