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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

अव्यक्तवक्ता विज्ञाता निर्ममो निरहंकृतिः । सुहृद्बन्धुस्तथा मित्रं मृत्युपुत्रो गुरुप्रभुः । सर्वदा सर्वथा सत्यं सर्वं सर्वस्य संस्तवे ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

वह भली प्रकार ज्ञाता होने के कारण सूक्ष्मतम अर्थो को विस्पष्टकर कहनेवाला, ममता तथा अहंकार से रहित, मृत्यु का पुत्र की नाई परमप्रिय, बुद्धि में वृहस्पति से भी बड़ा, प्राणिमात्र का सुहव, बन्धु एवं मित्र था । (सव प्राणियों का वह सुहृद आदिरूप क्यो था ? इस शंका पर कहते है ।) चूँकि यह सबके वर्णन प्रसंग में -प्राणीमात्र के निखिल आरोपों का अधिष्ठानरूप हो जाने के कारण सब प्रकार से भी सर्वदा सर्वात्मक सत्यस्वरूप ही परिगणित होता था यानी वह सर्वात्मक ओर सत्यस्वरूप ही सर्वसंगत था, अतः सुहृद आदिरूप था