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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 17, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 17, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

स्निग्धगम्भीरवचनः स्मितपूर्वाभिभाषणः । करस्थबिल्वफलवत्प्रतोलितजगत्त्रयः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके वचन रनेहपूर्णं ओर गम्भीर थे । उसके अभिभाषण के पहले स्मित होता था । हाथ में बिल्व फल की नाई तीनों जगत की इयत्ता (सीमा) उसे निश्चित रूप से विदित थी