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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 17, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 17, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

धीरस्थिरमहाकारो विश्रान्ति गतमन्दरः । परिपूर्णमनाः शुद्धः क्षीरार्णव इवागतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसका महान आकार धीर ओर स्थिर था । उसने विश्रान्ति तो उस प्रकार धारण की थी, जिस प्रकार मन्थन के अनन्तर मन्दराचल के चले जाने के बाद क्षीर-समुद्र ने धारण की थी । उसका मन मनोरथो से परिपूर्ण था ओर विशुद्ध था