Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 17, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 17, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
परिविश्रान्तधीः शान्तः परमानन्दघूर्णितः ।
आविर्भावतिरोभावतज्ज्ञः संसारजन्मनाम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
बाहर से उसकी चारों ओर से
बुद्धि में विश्रान्ति थी, वह शान्त था, भीतर से परमानन्द परिपूर्ण था, उसे संसार में जन्मधारी जीवों के
आविर्भाव ओर तिरोभाव में हेतुभूत मायातत्त्व और आत्मतत्त्व का भली प्रकार ज्ञान था