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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 17, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 17, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

सरभसवदनाभिरामरूपः प्रियमधुरोचितगानहृद्यवाक्यः । स्वयमिव नवमाश्रितः शरीरं सकलभयापहरं प्रहर्षयुक्तः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रिय ओर मधुर सुनने योग्य वीणा-गान की नाई मनोहर उसके वाक्य थे । दर्शनमात्र से संपूर्णं भयो का अपहरण करनेवाले स्वयं ब्रह्मा ने ही मानों अपना यह नवीन भुशुण्डशरीर धारण किया हो, ऐसा वह प्रतीत होता था, अतएव वह स्वाभाविक आनन्द से युक्त ओर प्रश्नों का उत्तर देने के लिए किये गये उद्योगयुक्त मुख के कारण अत्यन्त सुन्दर लगता था