Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 17, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 17, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
इदममलगिरा समाह शुद्धममृतमनुज्झितसंभ्रमक्रमेण ।
कथयितुमखिलं निजं स्वरूपं मधुपमिव स्तनितेन मुग्धमेघः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रकार का पक्षियों का अधिराज भुशुण्ड शुद्ध,
अमृतमय, परिपूर्णं स्व-स्वरूप का क्रमशः बोध कराने के लिए - निर्मल वाणी से उस तरह मेरे प्रति
आगे का वृत्तान्त कहने लगा, जिस तरह सुन्दर मेघ अपनी गर्जना से मकरन्द (पुष्परस के) पान में
रसिक भ्रमर के प्रति वही वृत्तान्त कहता हो। तात्पर्य यह हुआ कि पहले से ही प्रबुद्ध ब्रह्मानन्द में रसिक
मेरे प्रति भुश्ुण्ड की उक्ति अनुवाद मात्र थी, न कि उपदेश