Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
अस्त्यस्मिञ्जगति श्रेष्ठः सर्वनाकनिवासिनाम् ।
देवदेवो हरो नाम देवदेवाभिवन्दितः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्रहवाँ सर्गे समाप्त
अठारहवाँ सर्ग॑
अपना जन्म कहने के लिए पहले महादेवजी, उनके गण, मातृका तथा
उनके पानोत्सव आदि का भुशुण्ड के द्वारा वर्णन ।
“किस कुल में तुम उत्पन्न हुए हो“ इस प्रथम प्रश्न का उत्तर देने के लिए पहले भूमिका बधते है।
भुशुण्ड ने कहा : महाराज वसिष्ठजी, इस जगत में समस्त स्वर्गवासी देवताओं में श्रेष्ठ (ज्ञान,
ऐश्वर्य, बल आदि गुणों से सर्वोत्कृष्ट), देवताओं के भी पूजनीय एवं उपासनीय, देवाधिदेव महादेवजी
हैं, जो बड़े-बड़े देवों के देव ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा भी अभिवन्दित और चारों ओर से पूजित हैं।
(इस श्लोक में उपर्युक्त तीन विशेषणो से सवशि में महादेवजी के ही उत्कर्ष की परमावधि बतलाई गई
है, इससे वक्ष्यमाण ब्रह्मविद्या के आरम्भ में मंगल भी पक्षिराज भुशुण्ड ने कर दिया - यह अर्थतः सिद्ध
हो जाता है, यह जानना चाहिए)