Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
अन्याः पानं पपुः पुष्टचर्चिताङ्गशिरःखुरम् ।
लीलाघुरघुरारावरणदाकाशकोटरे ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
लीला से जनित घुरघुर शब्दों से आकाश के कोने में कुछ देवियाँ मस्तक से लेकर खुरपर्यन्त अंगों को
रक्त, चर्बी, आसव आदि से पुष्ट करने के लिए मद्यपान कर रही थीं