Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अन्या जगुर्ध्वनच्छैलग्रहमापानतोषिताः ।
वारीव रववद्रञ्जज्जगन्मण्डलकोटरे ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत-मण्डल की गुहा में मद्यपान से अतितृप्त हुई कुछ मातृकाएँ पर्वत एवं घरों को ध्वनियुक्त बनाती
हुई, चन्द्र के उदयरागसे रंजित अतएव शब्दयुक्त हुए समुद्र,जल के सदृश, गर्जना करने लगीं