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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verses 40–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 19, verses 40–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

बुद्धिपूर्वसमाचारैः संपूर्णं काकपुत्रकैः । शीतलाभ्यन्तरं हृद्यं पूरितं कुसुमोत्करैः ॥ ४० ॥ तद्गच्छत सुता नीडं दुर्गं नाकवतामपि । भोगं मोक्षं च तत्रस्था निर्विघ्रमलमाप्स्यथ ॥ ४१ ॥ इत्युक्त्वास्मान्पिता तत्र चुचुम्बाभ्यालिलिङ्ग च । ददौ देव्या यदानीतमस्मभ्यं च तदामिषम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

वह (घोंसला) विचारपूर्वक व्यवहार करनेवाले कौओं के पुत्रों से व्याप्त है तथा भीतर से अत्यन्त शीतल, मनोहारी और भाँति-भाँति के पुष्पों से पूरित है