Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 19, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
तद्भुक्त्वा चरणौ देव्याः पितुश्चैवाभिवाद्य च ।
विन्ध्यकच्छाद्वयं तस्मात्स्थानादालम्बुसात्प्लुताः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्यारे बच्चों, देवताओं से भी दुर्गम उस सुन्दर घोंसले पर तुम लोग जाओ, वहाँ निवास किये हुए तुम
लोग निर्विघ्न एवं पर्याप्तरूप से भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करोगे ॥ ४ १॥ इस प्रकार कहकर हमारे
पिता ने हम लोगों का चुम्बन और आलिंगन किया तथा भगवती के पास जो मांस लाया गया था, उसे भी
हमें दिया ॥४ २॥ उसे खाकर भगवती और पिताजी के चरणों में अभिवन्दन कर अलम्बुसा के निवासस्थान
उस विन्ध्यप्रदेश से हम उड़ गये