Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
मुनिस्त्वनुज्झितेनाथ तेनैव रघुनन्दनम् ।
क्रमेणोवाच वाक्यज्ञो वाक्यं वाक्यार्थकोविदम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर वाक्य रचना में पटु महामुनि वसिष्ठजी,
पहले से चले आ रहे क्रम से ही, वाक्यार्थ के विज्ञाता श्रीरघुनन्दन को कहने लगे