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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

यावदज्ञत्वमन्धत्वं वैवश्यं विषयाशया । मौर्ख्यान्मोहसमुच्छ्रायस्तावच्चित्तादिकल्पना ॥ ३४ ॥ यावदाशाविषामोदः परिस्फुरति हृद्वने । प्रविचारचकोरोऽन्तर्न तावत्प्रविशत्यलम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

जब तक पूर्णता का उदय नहीं होता है और जब तक सज्जनों के संसर्ग से मूर्खता का विनाश नहीं होता, तब तक चित्त आदि निम्नभाग की ओर जाते रहते हैं ॥३ २॥ तब तक सम्यक्‌ आत्मदर्शन के प्रभाव से यह जगत की वासना शिथिल नहीं हो जाती, तब तक विस्पष्टरूप से चित्त आदि रहते हैं ॥३ ३॥ जब तक अन्धता ओर मूर्खता रहती है, जब तक विषय की अभिलाषा से विवशता रहती है एवं जब तक मूर्खतावश मोह का ढेर बना रहता है, तब तक चित्त आदि की कल्पना रहती है