Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verses 31–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
देहे यावदहंभावो दृश्येऽस्मिन्यावदात्मना ।
यावन्ममेदमित्यास्था तावच्चित्तादिविभ्रमः ॥ ३१ ॥
यावन्नोदितमुच्चैस्त्वं सज्जनासङ्गसङ्गतः ।
यावन्मौर्ख्यं न संक्षीणं तावच्चित्तादिनिम्नता ॥ ३२ ॥
यावच्छिथिलतां यातं नेदं भुवनभावनम् ।
सम्यग्दर्शनशक्त्यान्तस्तावच्चित्तादयः स्फुटाः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक देह में अहंभावना रहती है,
जब तक इस दृश्य में आत्मरूपता रहती है, जब तक यह मेरा है, इस प्रकार की आस्था रहती है, तब
तक चित्त आदि भ्रम रहता है