Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
यावदज्ञानकलना यावदब्रह्मभावना ।
यावदास्था जगज्जाले तावच्चित्तादिकल्पना ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
क्या सदा ही ब्रह्म विकसित होता है 2 नहीं, ऐसा कहते हैं।
जब तक अज्ञान की कल्पना रहती है, जब तक अब्रह्म की भावना रहती है, जगज्जाल में जब तक
आस्था रहती है, तब तक चित्त आदि की कल्पना रहती है