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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

अन्तर्मुखतया सर्वं चिद्वह्नौ त्रिजगत्तृणम् । जुह्वतोऽन्तर्निवर्तन्ते मुनेश्चित्तादिविभ्रमाः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसीका स्पष्टीकरण करते है । भ सर्वात्मिक हूँ 'इस प्रकार की परिपूर्ण आत्मभावना से समस्त त्रिजगत-रूपी उपेक्षणीय तृणका चिदात्मक अग्नि में हवन कर रहे महामुनि के चित्त आदि विभ्रम दूर हो जाते हैं