Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
विवेकविशदं चेतः सत्त्वमित्यभिधीयते ।
भूयः फलति नो मोहं दग्धबीजमिवाङ्कुरम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव अज्ञानी के चित्त की अपेक्षा सत्व विलक्षण (भिन्न) है, इस आशय से कहते हैं।
विवेक से विशुद्ध हुआ चित्त सत्त्व कहा जाता है, विवेक निर्मल चित्त फिर मोहरूपी फल उस प्रकार
नहीं देता, जिस प्रकार दग्ध हुआ बीज अंकुर नहीं देता