Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
यावत्सत्त्वं विमूढान्तः पुनर्जननधर्मिणी ।
चित्तशब्दाभिधानोक्ता विपर्यस्यति बोधतः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक विमूढ मनुष्यों के भीतर वासना
चित्तशब्द से व्यवह्वत होती है, तब तक वह पुनर्जन्म की हेतु होती है, तत्त्वज्ञान हो जाने पर तो वह
सत्त्वरूप होकर उलटी हो जाती है यानी जन्मनिवृत्तिरूप विपरीत कार्य करती है