Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
संरोहतीषणाविद्धं यथा परशुनाग्निना ।
न तु ज्ञानाग्निनिर्दग्धं प्रबोधविशदं मनः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
तब कैसा अन्तःकरण पुनः अंकुरित होता है ? तो इस पर कहते हैं।
जिस प्रकार परशु से छिन्न अथवा अग्नि से दग्ध हुए भी तृण आदि यदि भीतर से बीजशक्ति
से युक्त रहे तो उससे पुनः अंकुर आदि की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार पुत्र, वित्त और लोक की
एषणारूपी बीजशक्ति से युक्त अन्तःकरण पुनः जनन आदि के प्रति हेतु हो सकता है, परन्तु
ज्ञानरूपी अग्नि से दग्ध हुआ एषणादि बीजशक्ति से शून्य तथा प्रबोध से निर्मल अन्तःकरण पुनः
जनन का हेतु नहीं होता