Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
चिदन्तरस्ति त्रिजगन्मरिचे तीक्ष्णता यथा ।
नातश्चिज्जगती भिन्ने तस्मात्सदसती मुधा ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार एकमात्र तीक्ष्णतारस से युक्त मिर्च के अन्दर
तीक्ष्णता मिर्चरूप से विद्यमान है, उस प्रकार चित् के अन्दर तीनों जगत भी चिद्रूप से ही रहते हैं,
इसलिए तत्त्वदुष्टि से चित् ओर जगत एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं, यही कारण है कि सदसदात्मक
वस्तुप्ररोह ओर उसका प्रलय मायाप्रयुक्त निरर्थक भ्रान्ति ही हे