Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
शब्दशब्दार्थसंकेतवासनेह न संविदा ।
चिद्व्योमत्वादुभे भातस्त्यजातः सदसन्मती ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या (असद्वा इदमग्र आसीत्” (सृष्टि के पहले यह जगत असदात्मक ही था) इत्यादि श्रुति
प्रसिद्ध ओर "घटोऽस्ति धटो नास्ति“ इत्यादि लोक प्रसिद्ध सत् ओर असत् शब्द निरर्थक हैं ? नहीं,
ऐसा उत्तर देते हैं।
यहो श्रोत ओर लौकिक व्यवहार में एक दूसरे से व्यावृत्त शब्द व्यावृत्त अर्थों में ही संकेतित हैं यानी
व्यावृत्त (एक दूसरे से भिन्न-भिन्न स्वरूपवाले) शब्द भिन्न-भिन्न अर्थो में ही अपना संकेत रखते हैं,
इसलिए वक्ता ओर श्रोता की वासना ही व्यावृत्ति (भेद) के आकार में भासती है। "सदसद्" शब्द से
उत्पन्न संवित् प्रामाणिक नहीं है, क्योकि असत्यरूप व्यावृत्ति शब्दार्थ नहीं हो सकती, यों व्यावृत्ति
पदार्थ का निरास होने पर "सदसद्" शब्द के वाच्यभूत दोनों अर्थ अव्यावृत्तानुगत चिदाकाशस्वरूप से
ही परमार्थरूपतः भासित हो गये, अतः वही परमार्थ वस्तु शब्दार्थ है, यह भाव हे