Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 54

संस्कृत श्लोक

अचिन्मयत्वान्नासि त्वं स्वात्मा किमिव रोदिषि । अचिन्मयत्वे जगतामभावे कल्पनं कुतः ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मत्वभ्रममूलक जन्म ओर मरण आदि अनर्थ-प्राप्ति से रोने का प्रसंग नहीं है, ऐसा कहते हैं। (्वम्‌ ' शब्द से व्यवह्वत होनेवाला सदसद्स्वभाव रामनामक स्वत: आत्मा नहीं है, क्योंकि शरीर चिन्मय है नहीं । समस्त जगत का अचिन्मयत्व ओर अभाव निश्चित हो जाने पर आपको देह आदि की कल्पना ही कैसे हो सकती है ?