Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
आद्यन्तवर्जितविशालशिलान्तरालसंपीडचिद्घनवपुर्गगनामलस्त्वम् ।
स्वस्थो भवाजठरपल्लवकोशलेखा लीलास्थिताखिलजगज्जय ते नमस्ते ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, आदि और अन्त से शून्य विशाल स्फटिक
शिला के अन्तराल की नाई निबिड जो चिद्घन है, उसके सदुश स्वभाववाले आप दुःख आदि विक्रियावाले
नहीं हैं, यह निश्चय करके स्वस्थ हो जाइए । चारों ओर के विस्तार से युक्त आपके चित्-शिलारूपी
जठर मेँ प्रतिविम्बित पल्लवकोश की नाई कल्पित माया की रेखा-सदृश वासना विशेषो मे मन की
कल्पना से स्थित अखिल जगतवाले हे श्रीरामजी, उक्त स्वरूपवाले आपको मे प्रणाम करता हूँ