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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

ईदृशेषु च भूतेषु निर्जनेषु वनेषु च । कल्पितास्थास्थितिर्धात्रा शून्ये वा व्योमवर्त्मनि ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी तुच्छ योनियों के लिए भी विधाता ने रनों, वनों और शून्यसदृश आकाश में प्रीतिपूर्वक जो जीविका की कल्पना की हे, यह अत्यन्त आश्चर्य का विषय है