Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
कथमस्यां प्रभो जातौ जातस्य चिरजीविनः ।
आशापाशनिबद्धस्य विहगस्य विशोकिता ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, इस तुच्छ जाति में उत्पन्न, चिरकाल से जीवन बीता रहा ओर आशारूपी
पाशो से निरन्तर बद्ध एक पक्षी किस तरह शोकवर्जित हो सकता है ?