Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
वयं तु भगवन्नित्यमात्मसंतोषमास्थिताः ।
न कदाचन नीरूपे मुह्यामो जातविभ्रमैः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, तथापि हम
अपनी आत्मा में ही सदा सन्तोष मानकर अवस्थित हैं, इसलिए उत्पन्न हुए विभ्रमो से कभी भी
परमार्थसत्ता से रहित इस जगत में मुग्ध नहीं होते