Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
स्वभावमात्रसंतुष्टाः कष्टैर्मुक्ता विचेष्टितैः ।
क्षिपामः केवलं कालमस्मिन्ब्रह्मन्निजालये ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, हम लोग अपने सत्तास्वभाव में
ही सन्तुष्ट रहते हैं, कष्ट पहुँचानेवाले परपीडन-व्यापारों से निर्मुक्त होकर अपने निवासस्थान इस
घोंसले में रहते हुए केवल कालयापन करते हैं