Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
न जीवितान्न मरणात्कर्मदेहस्य रोधनम् ।
यथा स्थितेन तिष्ठामस्तथैवास्तंगतेहिताः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, हम लोग अपने जीवन से न देह की
एेहिक या आमुष्मिक फल के लिए कोई क्रिया चाहते हैं और मरण से न देह का विनाश ही चाहते
हैं। जिस तरह वर्तमान में नित्यसिद्ध निरतिशयात्मरूप से पूर्णकाम होकर स्थित रहते हैं, उसी तरह
आगे भी स्थित रहेंगे