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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

भूतजालतरङ्गिण्या विशन्त्याः कालसागरे । वयं संसारसरितस्तटस्था अप्यनादृताः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञस्वरूप अपने में तटस्थता, समस्त भूतो के संसार का दरष्ट्रत्व और संसार के प्रति आदर का अभाव होने से भी भय की प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं। कालसागर में प्रवेश कर रही, प्राणि-समूह तरंगों से युक्त संसार-सरिता के तटपर अवस्थित हुए भी हम लोग उसमें आदर नहीं करते