Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 20, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 20, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
स्निग्धगम्भीरमसृणमधुरोदारधीरवाक् ।
त्रैलोक्यपद्मकोशेऽस्मिंस्त्वमेकः षट्पदायसे ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिवर, स्नेहपूर्ण, गम्भीरः मधुर, उदार
ओर धीर वाणीवाले एकमात्र आप ही इस त्रिभुवनरूपी कमल की कली में भ्रमर के सदृश हैं