Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
युगक्षोभेषु घोरेषु वाक्यासु विषमासु च ।
सुस्थिरः कल्पवृक्षोऽयं न कदाचन कम्पते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने आश्रय कल्पवृक्ष के माहात्म्य वर्णनप्रसंग मेँ युगविनाश काल में जनित उपद्रवो से अपने को
क्लेश की प्राप्ति नहीं होती, यों कहते हुए वृत्तं स्मरसि कि व वा“ इत्यादि प्रश्न का उत्तर देने के लिए
पक्षिराज भुशुण्ड वक्तव्य का उपक्रम करते हैं।
भुशुण्ड ने कहा : महाराज वसिष्ठजी, युग समाप्ति के महान उपद्रवो मे ओर भयंकर महापवनों
में भी यह कल्पवृक्ष अत्यन्त स्थिर रहता है, कभी भी कम्पित नहीं होता
सर्ग सन्दर्भ
बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीस सर्ग॑ कल्पवृक्ष का माहात्म्य, प्रलय में वारुणी आदि धारणाओं द्वारा अपनी स्थिति, ईश्वरीय नियमिका शक्ति और अनेक चित्र-विचित्र अर्थो के स्मरण का वर्णन |