Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
एवंरूपे द्रुमवरे तिष्ठतामापदः कुतः ।
अस्माकं मुनिशार्दूल दौःस्थित्येन किलापदः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनियों में सिंहरूप
महाराज वसिष्ठजी, इस प्रकार के उत्तम वृक्ष पर निवास कर रहे हम लोगों को आपत्तियाँ कहाँ से
हो सकती हैं, क्योकि वे आपत्तियाँ दुष्टस्थान मेँ निवास के कारण ही आती हैं