Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
प्रतपन्ति यदादित्याः शकलीकृतभूधराः ।
वारुणीं धारणां बद्ध्वा तदा तिष्ठामि धीरधीः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
सामान्यतः कथित आकाश स्थिति का धारणा भो से विशेष उल्लेख करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी, प्रलय के समय में जब पर्वतों को खण्ड-खण्ड कर देनेवाले बारह आदित्य
तपते हैं, तब मैं वरूणसम्बन्धी धारणा बाँधकर निश्चित होकर स्थित रहता हूँ । (तात्पर्य यह है कि जिस
प्रकार जल के बीच रहनेवाले वरुण बाहर के ताप से जनित संताप का अनुभव नहीं करते, उसी प्रकार
भ्रुशुण्ड भी अत्यन्त शीतल समस्त दिगृमण्डल में व्यापी अपरिच्छिन्न जल स्वरूप वरुण ही मैं हूँ” इस
प्रकार चित्त में निरन््तर वरुण भावना के द्वारा वरुणरूपताको प्राप्त होकर बाहर के सूर्यादि-तापजनित
संताप का अनुभव नहीं करते थे)