Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
आकाश एव तिष्ठामि विगताखिलकल्पनः ।
स्तब्धप्रकृतिसर्वाङ्गो मनो निर्वासनं यथा ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
(उस समय मैं) समस्त कल्पनाओं का परित्याग कर ओर निश्चल स्वभाववाले अंगों से
(&) गरुडस्य जातमात्रस्य सर्वे लोकाः प्रकम्पिताः । प्रकम्पिता मही सर्वा सप्तद्रीपाश्च कम्पिताः ॥
तदुत्पातान्निमज्जन्तीं भुवं नावमिवाऽम्भसि । दधौ सहस्रैः शिरसां संकर्षणवपुर्हरः ॥
“उत्पन्नमात्र गरुड को देखकर सब लोक कम्पित हुए, भूमि और साता द्वीप कोपने लगे । इन
उत्पातो से, जल में नाव की नाई, डूब रही पृथ्वी का संकर्षण शरीर महादेवजी ने हजारों मस्तकं
से धारण किया” इस कथा के अनुसार कहते हैं ।
युक्त होकर एकमात्र आकाश में ही, वासनाशून्य मन की नाई, स्थित रहता हूँ