Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verses 26–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 26, 27
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अत्यन्तमोक्षदीर्घायुर्भवान्निर्देशनायकः ।
ज्ञानविज्ञानवान्धीरो योगयोग्यमनोगतिः ॥ २६ ॥
दृष्टानेकविधानल्पसर्गसङ्गगमागमः ।
किं किं स्मरसि कल्याण चित्रमस्मिञ्जगत्क्रमे ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तुम्हारी आयु मोक्ष के सदुश अत्यन्त
अपरिच्छिन्न है, तुम सुदूर भूतकालीन पदार्थो का निर्देशन करने में सबसे बढ़-चढ़कर हो । तुम मोक्षहेतु
तत्त्वज्ञान ओर लौकिक समस्त शास्त्रादि विज्ञानं से परिपूर्णं हो, धीर हो और तुम्हारे मनोव्यापार
आत्मयोग में पर्याप्त रूप से योग्य हो चुके हे । तुमने तरह-तरह की असंख्य सृष्टियों की उत्पत्ति,
स्थिति ओर प्रलय देखे हैं, इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ कि तुम्हारे द्वारा देखे गये जगत मण्डल में
आश्चर्यकारी किस-किस जगत-क्रम का तुम स्मरण करते हो