Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
मत्संकल्पवशेनैव कल्पे कल्पे पुनः पुनः ।
अस्मिन्नेव गिरेः शृङ्गे तरुरित्थं भवत्ययम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्येक कल्प में इस कल्पवृक्ष के निर्माण में भी भोगजनक अदृष्ट में हेतुभूत मेरा संकल्प ही कारण
है, ऐसा कहते हैं।
कल्प-कल्प में बार-बार एकमात्र मेरे संकल्प से ही मेरुपर्वत के इसी शिखर पर इस तरह का यह
कल्पवृक्ष उत्पन्न होता है