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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

एकमेव स्वयं शुद्धं पुरुषासुरवर्जितम् । आलोकनिचयं चैकं कंचित्सर्गं स्मराम्यहम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरा आश्चर्य कहते हैं। एक समय यानी जब ब्रह्माण्डशरीर विराट्‌ उत्पन्न होकर अपने स्वरूप का आलोचन करने के लिए कुछ काल तक समाहित चित्त हुए थे, उस समय पुरुष एवं असुरों से वर्जित, स्वतःशुद्ध, प्रकाशस्वभाव तेजस पदार्थों का समष्टिरूप एक ही ब्रह्माण्ड था - इसका मुझे स्मरण है