Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
रामवद्व्यवहर्तव्यं न रावणविलासवत् ।
इति यत्र धियां ज्ञानं हस्ते फलमिवार्पितम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
उस ज्ञानशास्त्र में
मनोयोग देनेवाले महानुभावो के अन्तःकरण में हाथ में फल के सदृश, “श्रीरामजी की नाई व्यवहार
करना चाहिए ओर रावण के विलास की नाई विलास नहीं करना चाहिए यह ज्ञान समर्पित किया गया
हे