Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
वाल्मीकिनाम्ना जीवेन तेनैवान्येन वा कृतम् ।
एतच्च द्वादशं वारं क्रियते विस्मृतिं गतम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज
वसिष्ठजी, इस भावी वसिष्ठ-राम-संवादरूप ज्ञानशास्त्र की पूर्वकल्प के अथवा दूसरे किसी और
वाल्मीकिनामक जीव के द्वारा यद्यपि पहले ही रचना की गई थी, तथापि कल्प के अन्त में व्यवहारकर्ताओं
की परम्पराओं के उठ जाने से वह उच्छेद को प्राप्त हो गया था, अतः वर्तमान में उसकी पुनः बारहवीं
बार रचना की जायेगी