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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

वसुदेवगृहे विष्णोर्भुवो भारनिवृत्तये । अधुना षोडशं जन्म भविष्यति मुनीश्वर ॥ ३२ ॥ जगन्मयी भ्रान्तिरियं न कदाचन विद्यते । विद्यते तु कदाचिच्च जलबुद्बुदवत्स्थिता ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महर्षे, नृसिंहस्वरूप शरीर से भगवान ने हिरण्यकशिपु का, हाथी का मृगेन्द्र सिंह की नाई, तीन बार हनन किया ॥३ १॥ हे मुनीश्वर, पृथ्वी के भार की निवृत्ति करने के लिए भगवान विष्णु का सोलहवीं बार वसुदेवजी के घर में निकट द्वापर के अन्त में जन्म होगा