Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
दृश्यभ्रान्तिरनित्येयमन्तस्था संविदात्मनि ।
जायते लीयते चाशु लोला वीचिरिवाम्भसि ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
बाहर यह उत्पन्न होता है, यह भ्रान्ति है, इस आशय से कहते हैं।
महाराज, जगद्रूपा इस भ्रान्ति का कभी भी (कल्पान्त में) अस्तित्व नहीं है, जल में बुद्बुदों की नाई
स्थित हुई यह किसी समय ही (कल्पान्त में) अज्ञानवश अस्तित्व रखती हुई-सी प्रतीत होती है ॥ ३ ३॥
जल में तरंगों की नाईं अति चपल, आत्मा के अन्दर रहनेवाली यह अनित्य दृश्य पदार्थों की भ्रान्ति
संवित्-स्वरूप आत्मा में ही उत्पन्न ओर तत्क्षण लीन हो जाती है