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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verses 37–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verses 37–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 37,38

संस्कृत श्लोक

प्रतिमन्वन्तरं ब्रह्मन्विपर्यस्ते जगत्क्रमे । संनिवेशेऽन्यथाजाते प्रयाते संश्रुते जने ॥ ३७ ॥ ममान्यान्येव मित्राणि अन्य एव च बन्धवः । अन्य एव नवा भृत्या अन्य एव समाश्रयाः ॥ ३८ ॥ कदाचिदहमेकान्ते विन्ध्यकच्छकृतालयः । कदाचित्सह्यनिलयः कदाचिद्दर्दुरालयः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, प्रत्येक मन्वन्तर में जगत-क्रम का विपर्यास हो जाने पर, अवयव सन्निवेश का परिवर्तन हो जाने पर और प्रख्यात जनों का प्रलय हो जाने पर मेरे दूसरे ही मित्र दूसरे ही बान्धव, दूसरे नवीन ही सेवक और दूसरे ही निवास-स्थान हो जाते हैं