Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
प्राक्तनेनैव जातोऽयं संनिवेशेन पादपः ।
देहं त्यक्त्वा सुखं साधो नातः परिणतिं गतः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे साधो, इसीलिए अपने प्राक्तन शरीर का सूखपूर्वक त्यागकर यह वृक्ष पूर्वतन
अवयवसन्निवेश की अपेक्षा दूसरे अवयव-सन्निवेशरूप परिणति को प्राप्त नहीं हुआ है, किन्तु उसी
सन्निवेश से यह उत्पन्न हुआ है (प्रकृत श्लोक के उत्तरार्थ से (तुम्हारी नाई यह कल्पतरू चिरंजीवी
क्यो नहीं है” इस शंका का समाधान हो गया, क्योकि उक्त कथन से पक्षिराज भुुशुण्ड ने कल्पवृक्ष की
चिरजीविता नहीं बतलाई, किन्तु शोभा-सन्निवेश की समता से अभेद का उपचार ही बतलाया
है।)