Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
ध्यानान्ते तत्त्व एवैनं सर्गमालोक्य वेद्म्यहम् ।
अर्कादेर्ऋक्षसंच्चारान्मेर्वादिस्थानका दिशः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार पूर्व के अवयवो से भिन्न दूसरे अवयवो का ग्रहण करने पर भी उस प्रकारः प्रत्यभिज्ञा
कर रहे मेरा विनाश नहीं है इस प्रकार के गर्भित आशयवाली <विगुत्तरा5भूत् इत्यादि उक्ति का उपपादन
करते हैं।
सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रहों से एवं नक्षत्रों के उदय, अस्तमय आदि नियत संचरणों से नियत उत्तर
दिशा में अवस्थित मेरु आदि स्थान को लेकर ही पूर्व आदि दिशाएँ व्यवहृत होती हैं। दूसरे सर्ग में तो वे
दिशाएँ-उस मेरुपर्वत के ही दूसरे प्रकार से स्थित हो जानेपर, चित्रपट के परिवर्तन से उसमें चित्रित
मेरुपर्वत आदि के अधीन पूर्व आदि दिशाओं के परिवर्तन की नाईं व्यत्यस्त-स्थिति प्राप्त करती हैं