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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 22, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 22, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

संस्थानमन्यथा तस्मिन्स्थिते यान्ति दिशोऽन्यथा । न सन्नासज्जगन्मन्ये भ्रमयन्केवलं धियः ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अनियत स्थिति से दिशाओं का मिथ्यात्व सिद्ध होने पर तदनुसारी नियत अवयव- सन्निवेश घटित सभी जगत में अनिवर्चनीयतारूप मिथ्यात्व दिखाई पडता है, ऐसा कहते हैं। महाराज, यह जगत न सत्‌ है और न असत्‌ ही है - यही मैं मानता हूँ। आत्मा की मायिक विक्षेपशक्ति से उत्पन्न हुआ तथा बुद्धि को भ्रमित कर रहा यह प्रपंच केवल मिथ्या ही प्रकट हो रहा है