Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
यदुदर्कहितं सत्यमनपायि गतभ्रमम् ।
दुरीहितदृशोन्मुक्तं तत्परं कारयेन्मनः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी, (चूँकि समाहित चित्त को किसी प्रकार के गुण-दोष अस्त-
व्यस्त नहीं कर पाते, इसलिए ) जो तत्त्व उत्तरकालिक सुख का हेतु, अबाध्य, अविनाशी, अविद्याशून्य
एवं विषय की अभिलाषारूपी दृष्टि से वर्जित आत्म-लाभस्वरूप है, उसी एक तत्त्व में मन को स्थिर
करना चाहिए