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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verses 25–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

सामरासुरगन्धर्वे सविद्याधरकिन्नरे । ससुरस्त्रीगणे स्वर्गे न किंचित्सुस्थिरं शुभम् ॥ २५ ॥ सतरौ सनराधीशे सपर्वतपुरव्रजे । साम्बुधौ भूतले तात न किंचिच्छोभनं स्थिरम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

अब परम तत्त्व में सबसे बढ़-चढ़कर सौभाग्यरूपता है, इसका दूसरे सुखो में अनित्यत्व-प्रतिपादन द्वारा साधन करते हैं। देवताओं, असुरो एवं गन्धर्वो से व्याप्त; विद्याधरो ओर किन्नरों से युक्त तथा देवता-रमणियों से सुशोभित स्वर्ग में कुछ भी सुस्थिर एवं उत्तम तत्त्व विद्यमान नहीं है