Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 23, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 23, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
सनागे सासुरव्यूहे सासुरस्त्रीगणे तथा ।
समस्त एव पाताले न किंचिच्छोभनं स्थिरम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रीतिपात्र, वृक्षों से राजित,
राजा-महाराजाओं से युक्त; पर्वत, नगर एवं व्रजभूमि से शोभायमान तथा समुद्र से युक्त भूतल में कुछ
भी स्थायी ओर शोभन तत्त्व नहीं है॥ २ ६॥ ब्रह्मन्, जहौ नागो का निवास है, असुरों के समूह हैं तथा असुरों
की स्त्रियों का समुदाय है, समस्त उस पाताल लोक में भी कुछ स्थिर एवं सुखरूप पदार्थ नहीं है